कविता रै’वै है
चांद कै कनै च्यापळ्योड़ी।
जद रात, पिया नै हेरै,
अर चांद पसवाड़ौ फेरै,
जणां कविता नीसरै।
कविता रै’वै है
जिमि में दब्योड़ी।
जद कमेड़ी डाळ्या पर गावै,
अर हाळी खेत नै बा’वै,
जणां कविता लाधै।
कविता रै’वै है
बायरा में रळ्योड़ी।
जद धरती परकमा देवै,
अर प्रकति धूपियौ खेवै,
जणां कविता री सोरम आवै।
कविता रै’वै है
आपणै आरै-सारै ई।
जद आपां आंख्यां मींचां,
अर सबदां नै हिया में सींचां,
जणां कविता निंगै आवै।
कविता है अेक,
बिन पै’रांण की अणजांण मूरत,
जकी कै आपां नै हाथ ई नई लगाणौ है,
नई तो बा आपणै हाथ कोनी लागैली।

बौत सानदार रचना। माटी री सौरभ सूं महकती रचना सारूं हियै सूं बधाई
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